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मौन में बड़ी ताकत है।

मौन में बड़ी ताकत है।


रमेश 77 साल की उम्र का बुजुर्ग व्यक्ति था।  वह बहुत खुशी से रहते थे और उन्होंने एक सुंदर परिवार बनाया था। जब उनके बच्चे बड़े हो गए तब वह सभी अच्छे करियर और भविष्य की तलाश में विभिन्न शहरों में चले गए। उसके बाद रमेश अपनी मृत पत्नी की यादों के साथ अकेले उनके गाँव में रहते थे। रमेश के 4 पोता-पोती थे और वे अपनी छुट्टियों के दौरान उनसे मिलने आते थे।


गर्मियों की छुट्टी का समय था और रमेश अपने पोता-पोती के आने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। वह बच्चों के लिए अपने घर की साफ़ सफाई कर रहा थे, बगीचे की खुदाई कर रहा थे, घरेलू सामानों को फिर से व्यवस्थित कर रहा थे, बच्चों के पसंदीदा खाद्य पदार्थ, बच्चों के लिए कपड़े आदि खरीद रहे थे। इन सभी व्यस्त व्यवस्थाओं में उन्होंने अपनी पसंदीदा पुरानी घड़ी खो दी।

 यह घड़ी उनकी मृत पत्नी ने उपहार में दी थी जब उनका पहला बच्चा पैदा हुआ था। रमेश ने उस घड़ी को क़ीमती बनाया और यह उनकी पत्नी की मृत्यु के बाद उनका एकमात्र साथी बन गया।


 वह घड़ी को भूल गये और घर में बच्चों को पाकर खुश थे।  अगले दिन ही जब वह स्नान करने वाले थे, तब उन्हें याद आया कि उनकी पसंदीदा घड़ी ग़ायब थी। उन्होंने आख़िरी बार उस घड़ी को देखा था, जब वह खलिहान में चीजों की साफ सफ़ाई कर रहा थे। वह हैरान और बहुत परेशान थे।

 उनके पोता-पोती ने उनसे जाकर पूछा कि वह इतने खामोश, दुःखी और परेशान क्यों हैं?

तब रमेश ने कहा, 'प्यारे बच्चों, मैंने अब तक की सबसे कीमती घड़ी खो दी है। वह आपकी दादी द्वारा उपहार में दि गई एकमात्र उनकी याद थी। और मैंने घर की सफाई करते समय उसे खो दियाहैं! मुझे ऐसा लग रहा है कि मुझे वह क़भी वापस नहीं मिलेंगी।

 रमेश की आँखों में से आंसु बह रहे थे, तभी सभी बच्चों ने उनसे वादा किया कि वे उनके लिए घड़ी की खोज करेंगे।

 एक बच्चे ने पूछा दादाजी, क्या आपको याद है कि आपने आखिरी बार उस घड़ी को कब देखा था उसके बाद यह गायब हो गई?'

 रमेश ने बताया, 'मुझे लगता है कि जब मैं खलिहान की सफाई कर रहा था! तब शायद।'



 बच्चों ने खलिहान में घड़ी की तलाश करने का फैसला किया।  खलिहान में बेकार सामग्री, किताबें, खुरचनी, टूटा फर्नीचर आदि भरा हुआ था।

 बच्चों ने रमेश और एक नौकर की मदद से 2 घंटे से अधिक समय तक खोज की, लेकिन वह घड़ी नहीं मिली।  रमेश पूरी तरह से बिखर गया और बच्चों को खोज बंद करने के लिए कहा क्योंकि उन्हें कुछ भी नहीं मिला।

 बच्चे भी बहुत दुखी थे, और दादाजी को सांत्वना दे रहे थे।

 पर तभी एक बच्चा फिर से खलिहान में चला गया, और रमेश ने पूछा कि वह फिर से वहां क्यों जा रहा है। तब उस छोटे बच्चे ने दूसरों से अनुरोध किया कि वे उसके पीछे ना आए और थोड़ी देर तक चुप रहें।

 उस बच्चे की इस बात से सभी लोग थोड़े हैरान थे, फिर भी उन्होंने उसकी बात का पालन किया। वह छोटा लड़का खलिहान में गया और थोड़ी देर बाद वहाँ सन्नाटा छा गया।

 दूसरे बच्चे भी उसके पास पहुँचे और उससे पूछा कि वह क्या कर रहा है तब उस छोटे लड़के ने उन्हें शोर न करने के लिए कहा।


 वह वहां लगभग 15 मिनट तक बैठे रहे और फिर सभी अपने दादा के पास पहुंचे। हां, उनको घड़ी मिल गई थी और उन्होंने उसे खुशी से अपने दादाजी को दे दिया।

 रमेश हैरान थे और उन्होंने पूछा कि तुमको यह घड़ी कैसे मिली? छोटे लड़के ने जवाब दिया, 'मैं बिना शोर किए वहाँ बैठ गया और खलिहान में इतना सन्नाटा था की कुछ मिनटों के बाद, मैंने 'टिक टिक' की ध्वनि सुनी और मुझे घड़ी दिख गई।



 रमेश ने उसे गले लगाया और उसको धन्यवाद कहा।

 यह मौन की ताकत है। यदि हम शांत रहें, तो हम किसी भी परिस्थितियों का समाधान बहुत आसानी से पा सकते हैं!

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